जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षा पद्धति, अनुशासन तथा शिक्षक के स्थान

जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षा पद्धति, अनुशासन तथा शिक्षक के स्थान 


शिक्षा के उद्देश्य-

जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षा पद्धति, अनुशासन तथा शिक्षक के स्थान
जॉन डीवी के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षा पद्धति, अनुशासन तथा शिक्षक के स्थान 


वर्तमान जीवन में उचित साधनों का उपयोग ही भविष्य के लिए तैयारी है। शिक्षा का उद्देश्य बालक की रुचि के अनुसार सम्यक् विकास है। सामाजिक कुशलता उसकी आधारभूत शिला है।"भोजन तथा सन्तानोत्पत्ति जिस प्रकार भौतिक-शारीरिक जीवन के लिए है ठीक उसी प्रकार शिक्षा समाज के लिए है।" उपयोगिता पर परखी हुई शक्तियों का विकास ही बालक में होना चाहिए।

डीवी तथा पाठ्यक्रम


परम्परागत विषयों की निर्धारित सीमाएँ भ्रामक हैं। ज्ञान एक है, सम्पूर्ण सामाजिक जीवन की एकता विषयों की एकता में परिलक्षित होनी चाहिए। लचीले पाठ्यक्रम द्वारा ही बालक समाज की सहायता प्राप्त कर सकता है। डॉ. अदवाल ने उदाहरण दिया है कि डीवी के विचार से प्रारम्भिक विद्यालय का आधार बालक की चार अभिरुचियाँ (भाव-विनिमय तथा संवाद, जिज्ञासा, रचना तथा सौन्दर्याभिव्यक्ति) ही होनी चाहिए। अस्तु, पाठ्यक्रम में पठन, लेखन, गणना, हस्तकार्य तथा चित्रकला का समावेश होना चाहिए। शैक्षिक अनुभवों तथा समस्याओं से पाठ्यक्रम पूरा होना चाहिए। बालक द्वारा पूर्व-अर्जित ज्ञान भविष्य के ज्ञानार्जन के लिए आधार रुप होना चाहिए। पाठ्यक्रम बालकों के वर्तमान अनुभवों पर ही निश्चित करना ठीक होगा। विभिन्न विषयों में समन्वय होना चाहिए।

शिक्षा पद्धति


"करके सीखना" के पद्धति के अनुसार एक क्रिया का बालक की अभिरुचि के अनुसार तथा उपयोगिता के आधार पर चुनाव होता है, वह क्रिया से सम्बंधित कछ

विषयों का ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है। बुनियादी शिक्षा प्रणाली तथा योजना पद्धति (जिसका पहले कोई नाम न था) मूलतः एक ही विचार से प्रेरित है। यह पद्धति बालक में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता तथा मौलिकता के विकास में सहायक होती है।

प्रो. चार्ल्स हार्डी के अनुसार योजना पद्धति की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं 
1. जो काम बालक को कराना है, उसका सुझाव वह स्वयं रखे।

2. उन्हे केवल वही कार्य करके देना चाहिए जिनमें उत्तम चित्तवृत्तियों का निर्माण हो।

3. इन कार्यों की पूर्ति के लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता हो, उस ज्ञान को देना चाहिए।

4. बालक के समस्त कार्यों में सहायता व पथ-प्रदर्शन की आवश्यकता है जिससे वे आगामी अनुभवों की अभिवृद्धि कर सकें।

डीवी तथा अनुशासन


समाजोन्मुखी शिक्षा में बालक के सहयोग द्वारा तथा स्कूल के कार्यों द्वारा उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करके हम उसमें आज्ञापालन, अनुशासन, नियम आदि आवश्यक बातों को चरित्र-निर्माण का अंग बना सकते हैं। सहयोग तथा रुचि पर आधारित शिक्षा में अनुशासन के भंग होने की आशंका ही सम्भव नहीं। बल का प्रयोग अनुशासन की व्यवस्था में अनुचित है। वैयक्तिक पक्ष को वह सामाजिक पक्ष के सम्मुख झुकाकर अनुशासन की समस्या हल कर देता है । प्रजातंत्र में सहयोग, आत्मनिर्भरता, क्षमता इत्यादि की उन्नति होती है। कुर्ट लेविन तथा लिप्पिट के प्रयोगों द्वारा यह बात सिद्ध हो चुकी है। इसलिए ऐसे स्कूलों में जिनमें प्रजातांत्रिक समाज का प्रतिबिम्ब हो, इन गुणों का विकास तथा अनुशासन की स्थापना स्वाभाविक रुप से हो जाती है।

शिक्षक का स्थान


डीवी के लिए स्कूल एक मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक आवश्यकता है। बालक के अनुभवों तथा समाज के साथ स्कूल के संबंध के आधार पर ही स्कूल का उपयुक्त आवश्यकताओं से संबंध होता है।

    डीवी के लिए स्कूल में शिक्षक बालकों को समाजोन्मुख करने के लिए एक विशेष व्यक्ति है। वह समाज का प्रतिनिधि है। बालक की रुचि, उसके सुझाव, उसकी आवश्यकताएँ ही शिक्षक के सम्मुख होनी चाहिए। बालकों को कार्य क्षेत्र से बाहर न ले जाये तथा अनुशासन कायम रहे। शिक्षक को अपनी परिष्कृत बुद्धि, परिमार्जित व्यक्तित्व, बालकों के ज्ञान तथा समाज के हेतु तैयारी के आधार पर बालकों की सहायता करनी चाहिए।

डीवी के दर्शन का मूल्य तथा प्रभाव


डीवी का दर्शन भी इस बात का अपवाद नहीं है कि दार्शनिक प्राचीन विचारों के विरुद्ध नवीन विचारों का प्रतिपादन किया करता है। प्लेटों को समझने के लिए हमें उस समय के सोफिस्ट्स (Sophist) को समझना होगा। धर्म तथा संस्थाओं की रुढ़ियों के साथ-साथ वैज्ञानिक प्रगति का विकास हो रहा था। हीगल के सक्रिय दर्शन से डीवी को अनुभव हुआ कि वह इन रुढ़ियों से हटकर प्रगति की बात कर सकेगा।

डीवी का प्रभाव हम रस्क के शब्दों में कह सकते हैं कि “आधुनिक औद्योगिक तथा यान्त्रिक विकास को पाठ्यक्रम में स्थान दिलाने में इस प्रायोगिक तथा नैमित्तिक विचारधारा ने परम्परागत शिक्षा की पूर्ति की है। समाज तथा स्कूल का अभिन्न सम्बंध बताकर, बालक की अभिरूचि, रचनात्मक तथा प्रयोगों द्वारा सत्य का निर्धारण करके डीवी ने आधुनिक शिक्षा-प्रणाली पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाला है। बालक की अभिरुचियों को ध्यान में रखकर उसने अनुशासन की समस्या पर नवीन रोशनी डाली है। स्वशासन, आत्मनिर्भरता, सहयोग, स्वतंत्रता तथा प्रजातंत्र की भावनाएँ डीवी ने बलपूर्वक प्रकट की हैं। इसी वातावरण में बालक का विकास संभव बताकर उसने रुढ़िगत मूल्यों को हटा फेंका। उसकी योजना पद्धति का प्रभाव विश्वव्यापी है।
    
    "करके सीखना", "सहयोग से कार्य करना" इत्यादी बातों में वह फ्रोबेल के साथ है, शिक्षाको विकास मानकर तथा वर्तमान के लिए वह स्पेन्सर के विरुद्ध है तथा शिक्षक को केवल निरीक्षक का स्थान देकर वह रुसो के साथ है। हरबार्ट के विवेक पर महत्त्व तथा पंचपद प्रणाली का वह विरोध करता है। वह आत्म-क्रिया पर बल देता है। रुसो के विपरित समाज को अधिक महत्त्व देता है।
Kkr Kishan Regar

Dear Friends, I am Kkr Kishan Regar, a passionate learner in the fields of education and technology. I constantly explore books and various online resources to expand my knowledge. Through this blog, I aim to share insightful posts on education, technological advancements, study materials, notes, and the latest updates. I hope my posts prove to be informative and beneficial for you. Best regards, **Kkr Kishan Regar** **Education:** B.A., B.Ed., M.Ed., M.S.W., M.A. (Hindi), P.G.D.C.A.

एक टिप्पणी भेजें

कमेंट में बताए, आपको यह पोस्ट केसी लगी?

और नया पुराने
WhatsApp Group Join Now
WhatsApp Group Join Now