भारत में अंग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था

भारत में अंग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था

ग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
अंग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था अलग तरह की थी। प्राचीन भारत में मुनियों एवं महर्षियों ने शिक्षा की समुचित व्यवस्था की थी। यह शिक्षा दो रूपों में उपलब्ध थी
(1) प्रारम्भिक शिक्षा, 
(2) उच्च शिक्षा।

भारत में अंग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था
भारत में अंग्रेजों के पूर्व देशज शिक्षा व्यवस्था

    प्रारम्भिक शिक्षा का उल्लेख प्राचीन समय में कहीं नहीं मिलता। उस समय बालकों को घर में ही शिक्षा दी जाती थी। वैदिक काल में सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा के विषयों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके लिए पृथक् गुरुकुलों की स्थापना की गयी थी। वैदिक काल में उच्च शिक्षा का श्रीगणेश माना जाता है।
अंग्रेजी शासन के पूर्व भारत में देशज शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।

    वैदिक काल के पश्चात् बौद्धकालीन शिक्षा के केन्द्र बौद्ध मठ थे। बौद्धों ने अपने मठों से पृथक् या स्वतंत्र रूप से शिक्षा प्राप्त करने या प्रदान करने का अवसर किसे भी नहीं दिया था। यद्यपि धार्मिक एवं लौकिक शिक्ष की व्यवस्था पूर्णत: भिक्षुओं के हाथ में भी फिर भी इसका संचालन लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित था। वैदिक कालीन शिक्षा की तरह की बौद्धकालीन शिक्षा भी दो रूपों में व्यवस्थित थी (1) प्रारम्भिक शिक्षा, (2) उच्च शिक्षा।

    प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था बौद्ध मठों में थी। यह केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही नहीं वरन् जनसाधारण के लिये भी सुलभ थी। उच्च शिक्षा की व्यवस्था भी बौद्ध मठों एवं विहारों में थी परन्तु सभी मठों या विहारों में समान विषयों की शिक्षा नहीं दी जाती थी। इनमें छात्रावास भी सम्बद्ध थे। इन मठों एवं विहारों में कुछ तो विश्वविद्यालय के स्तर की ख्याति अर्जित कर चुके हैं। इनमें सभी धर्मों एवं जातियों के बालकों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था।

    बौद्धकालीन शिक्षा के पश्चात् मध्यकालीन शिक्षा मनुतनों एवं मदरसों में व्यवस्थित थी। भक्तन प्रारम्भिक शिक्षा और मदरसा उच्च शिक्षा के केन्द्र थे। मुस्लिम शासकों, धनी व्यक्तियों एवं विद्या-प्रेमियों ने मस्जिदों से जुड़े हुए भक्तन तथा मदरसे स्थापित किये थे।
 भारत में अंग्रेजों से पूर्व देशज शिक्षा कैसी थी? स्पष्ट कीजिए।

देशज शिक्षा 


    अंग्रेज अधिकारियों का मानना थ कि भारत में लगभग प्रत्येक गाँव में एक विद्यालय है। यह बात सत्य तो प्रतीत नहीं होती, परन्तु काफी अंचलों में विद्यालयों का जाल था। आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालय नहीं थे। आज भी प्रायः आदिवासी क्षेत्रों में विद्यालयों की संख्या कम ही है। 10 प्रतिशत पुरुष ही साक्षर थे। दलितों व महिलाओं की शिक्षा नगण्य थी। कृषकों के बालकों को शिक्षा दी जाती थी।

    देशज विद्यालों में आम तौर पर पढ़ना, लिखना और अंक गणित सिखाया जाता था। परन्तु इसका मूल रूप धार्मिक तथा वाणिज्यिक था। साक्षरता की दर कम थी। देशज शिक्षा की खासियत स्थानीय परिवेश में उसकी अनुकूलता, जीवन्तता और समुदाय आधारित थी। देशज शिक्षा व्यवस्था ऐसी टोस व्यवस्था थी कि, विविध आर्थिक परिस्थितियों और राजनीतिक व्यवस्थाओं तथ परिवर्तनों में भी विकसित थी। उसमें केवल एक ही कमी थी कि उसमें बालिकाओं तथा दलितों का अभाव था।

    देशज शिक्षा केन्द्र स्थानीय लोगों की पहल तथा मदद से चलाए जाते थे। वे स्थानीय समुदाय के प्रति उत्तरदायी थे। उसे मिलकर चलते थे। समुदाय के साथ उनका रिश्ता ही उनकी ताकत थी।


    देशज शिक्षा संस्थान बिना राजनीतिक सहयोग के ही चलते थे। इन संस्थानों को यदि थोड़ी बहुत सरकारी मदद मिलती तो ये ही शिक्षा संस्थान सार्वजनिक शिक्षा के अच्छे केन्द्र भी बन सकते थे। आज भी कई समुदाय आधारित उच्च स्तरीय शिक्षा संस्थान है। परन्तु समुदाय आधारित शिक्षा संस्थानों में धर्म व जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।

Kkr Kishan Regar

Dear Friends, I am Kkr Kishan Regar, a passionate learner in the fields of education and technology. I constantly explore books and various online resources to expand my knowledge. Through this blog, I aim to share insightful posts on education, technological advancements, study materials, notes, and the latest updates. I hope my posts prove to be informative and beneficial for you. Best regards, **Kkr Kishan Regar** **Education:** B.A., B.Ed., M.Ed., M.S.W., M.A. (Hindi), P.G.D.C.A.

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